डिजिटल युग और सोशल मीडिया पर जातिगत नफ़रत
आज हम एक ऐसे दौर में हैं जहाँ जानकारी पाना कुछ सेकंड की बात हो गई है। स्मार्टफोन और तेज़ इंटरनेट ने हर व्यक्ति को दुनिया से जोड़ दिया है। फेसबुक, ट्विटर (X), यूट्यूब और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म ने आम आदमी के हाथ में वह ताक़त दे दी है जिसके बारे में एक दशक पहले तक किसी ने सोचा भी नहीं था आज के समय में अपने विचार लाखों लोगों तक तुरंत पहुँचा देना एक कामयाबी है किन्तु इस आज़ादी के साथ एक गम्भीर समस्या भी बढ़ गई है , आज के समय में आए दिन हम देख रहे है कि, गलत सूचनाओं, नफ़रत भरे विचारों और समाज को बाँटने वाली मानसिकता का बहुत तेज़ी से फैलना। भारत जैसे विविध और जातिगत रूप से जटिल समाज में यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। जो भेदभाव और पूर्वाग्रह पहले गली-मोहल्लों तक सीमित थे, वे अब डिजिटल स्क्रीन पर आ गए हैं और देश के कोने-कोने में फैल रहे हैं।
सोशल मीडिया को अगर एक तरफ देखा जाए तो यह लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ है, एक ऐसा मंच जो हर किसी को अपनी बात कहने का अधिकार देता है। लेकिन दूसरी तरफ वही मंच हेट स्पीच, नक्सलबाद, कट्टरपंथ और जातिगत नफ़रत का अड्डा भी बन चुका है। असली चुनौती यह है कि इस तकनीक का इस्तेमाल समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने के लिए भी हो रहा है। यही वजह है कि इस विषय पर गहराई से बात करना, उसके कारण और असर समझना, और फिर समाधान तलाशना ज़रूरी है। इंटरनेट का भारत में सफर 90 के दशक में शुरू हुआ, लेकिन उस समय यह आम लोगों की पहुँच से दूर था। असली गेम-चेंजर 2007 में स्मार्टफोन और 4G नेटवर्क का विस्तार रहा, जिसने सोशल मीडिया को हर जेब तक पहुँचा दिया। 2016 में जब डेटा प्लान बेहद सस्ते हो गए, तो इंटरनेट ने गाँव-गाँव में अपनी पकड़ बना ली। नतीजा यह हुआ कि वह चीज़ जो कभी सिर्फ़ अखबार, रेडियो या टीवी के ज़रिए लोगों तक पहुँचती थी, अब सीधा एक टैप में उपलब्ध हो गई। सोशल मीडिया के शुरुआती दौर में यह मज़ेदार वीडियो, तस्वीरें और दोस्तों से जुड़े रहने का जरिया था। लेकिन धीरे-धीरे यह सूचना, विचारों और बहस का सबसे तेज़ ज़रिया बन गया। आज फेसबुक पर राजनीतिक चर्चाएँ होती हैं, ट्विटर पर ट्रेंड चलते हैं, यूट्यूब पर लंबे एनालिसिस और रिपोर्ट आते हैं, और व्हाट्सएप पर हर तरह की फोटो-वीडियो आती है। लेकिन इसी तेज़ी और पैमाने के कारण यह मंच अब गलत हाथों में जाकर नफ़रत और झूठ फैलाने का हथियार भी बन गए हैं, जिन्हें काबू में रखना आसान नहीं है।
अब होता क्या है कि भारत की सामाजिक बनावट में जाति का असर गहरा है। हज़ारों साल पुरानी यह व्यवस्था पहले काम और भूमिका के आधार पर बनी थी, लेकिन धीरे-धीरे यह जन्म-आधारित, कठोर और भेदभावपूर्ण हो गई। आजादी के बाद संविधान ने जातिगत भेदभाव को गैरकानूनी करार दिया, आरक्षण जैसी नीतियाँ बनाईं, और समानता की बात की। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि जाति का असर अभी भी शिक्षा, नौकरी, राजनीति, और यहाँ तक कि शादी-ब्याह में दिखता है। अब यह असर सिर्फ़ गांव या शहर तक सीमित नहीं है डिजिटल दुनिया में भी जातिगत पहचान और भेदभाव खुलकर सामने आने लगे हैं। सोशल मीडिया पर सिर्फ़ राजनीतिक या धार्मिक बहस ही नहीं बल्कि ऐसे कमेंट, मीम्स और पोस्ट दिखते हैं जो सीधे-सीधे किसी जाति को नीचा दिखाते हैं। पहले एक गली या मोहल्ले तक फैली नफ़रत अब एक क्लिक में हज़ारों किलोमीटर दूर तक पहुँच जाती है। सोशल मीडिया के ओपन और फ्री नेचर का फायदा उठाकर कुछ लोग जातिगत दुश्मनी फैलाने में लगे रहते हैं। कोई गाली-गलौज वाली टिप्पणी लिखता है, कोई मीम के जरिये किसी समुदाय का मज़ाक उड़ाता है, तो कोई झूठी खबर के सहारे नफ़रत को हवा देता है। कई बार यह अकेले व्यक्ति का काम नहीं होता। कुछ संगठन या ग्रुप बाकायदा एक प्लान के तहत यह सब करते हैं।इस तरह की नफ़रत का असर सिर्फ़ ऑनलाइन बहस तक ही नहीं रहता। यह लोगों के मन में गुस्सा और अविश्वास भर देती है, जिससे असली ज़िंदगी में भी झगड़े और हिंसा हो सकती है। खासतौर पर युवाओं पर इसका असर ज़्यादा होता है क्योंकि वे सोशल मीडिया पर सबसे ज़्यादा वक्त बिताते हैं और जल्दी प्रभावित हो जाते हैं।सोशल मीडिया का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यहाँ एक झूठ को सच बनने में ज़्यादा समय नहीं लगता। पहले खबरें अखबार, रेडियो या टीवी पर जाने से पहले संपादकों और रिपोर्टरों की कई परतों से गुजरती थीं। लेकिन अब कोई भी व्यक्ति अपनी मर्ज़ी की जानकारी—चाहे वो सही हो या ग़लत—सीधे लाखों लोगों को भेज सकता है। व्हाट्सएप और फेसबुक के ग्रुप्स, ट्विटर के थ्रेड्स और यूट्यूब के वीडियो इस काम में सबसे आगे हैं। कोई पुरानी फोटो उठाकर उसे नई घटना से जोड़ देता है, कोई आधा सच और आधा झूठ मिलाकर ऐसी कहानी बना देता है कि सुनने वाला गुस्से से भर जाए। भारत जैसे देश में, जहाँ लोग अब भी खबरों की सच्चाई जाँचने के बजाय ‘किसने भेजा’ इस पर भरोसा कर लेते हैं, फेक न्यूज़ एक धमाकेदार हथियार बन चुकी है। राजनीति के वक्त इसका इस्तेमाल मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए किया जाता है। दंगे-फसाद के वक्त अफवाहें फैलाकर माहौल खराब किया जाता है। और जातिगत नफ़रत भड़काने के लिए झूठी खबरों का इस्तेमाल तो आम बात है—किसी जाति के खिलाफ अपराध की फेक स्टोरी गढ़ लेना, किसी विशेष समुदाय को बदनाम करने के लिए पुरानी घटना को नए रूप में पेश करना, या एडिटेड वीडियो बनाकर उसे वायरल कर देना। समस्या ये है कि एक बार ऐसा मैसेज हजारों लोगों तक पहुँच जाए तो उसका सच कोई नहीं ढूँढता, लोग मान लेते हैं कि ये सही है, और उससे जो नुकसान होना है, वो हो ही जाता है। सोशल मीडिया ने सभी को अपनी राय रखने का मौका दिया है, लेकिन इसके साथ ही 'ट्रोलिंग' जैसी बीमारी भी पैदा हो गई है। ट्रोलिंग का मतलब सिर्फ़ मज़ाक उड़ाना नहीं बल्कि लगातार किसी को परेशान करना, उसे भड़काना, या दूसरों के सामने उसकी छवि खराब करना है। भारत में ट्रोलिंग का रूप कई बार बेहद गंदा और खतरनाक हो जाता है, खासकर तब जब विषय जाति या धर्म से जुड़ा हो। जैसे ही किसी दलित नेता, आदिवासी कार्यकर्ता या पिछड़े वर्ग के छात्र ने अपने हक की बात की, तो तुरंत कुछ लोग या तो गालियों से भर देते हैं, या अपमानजनक मीम बना देते हैं, या फिर जान से मारने जैसी धमकियाँ दे डालते हैं। ये सब सिर्फ स्क्रीन पर होता दिखता है, लेकिन इसका असर असली ज़िंदगी पर गहरा पड़ता है। कई लोग जो इस तरह के ऑनलाइन हमलों का शिकार बनते हैं, वे मानसिक तनाव, अवसाद और कई बार सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ने की स्थिति में पहुँच जाते हैं। महिला कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के लिए यह और भी खतरनाक है क्योंकि उनके खिलाफ अक्सर ट्रोलिंग में यौन हिंसा की धमकियाँ और बेहद अश्लील टिप्पणियाँ शामिल होती हैं। ट्रोलिंग का एक संगठित रूप भी है, जहाँ कुछ 'ऑनलाइन गैंग' मिलकर किसी एक व्यक्ति को निशाना बनाते हैं। वे तय करते हैं कि किसे “टारगेट” करना है और फिर लगातार उस पर टिप्पणियाँ, ट्वीट और पोस्ट डालकर उसका सोशल मीडिया अनुभव बर्बाद कर देते हैं। कई बार उनका मकसद सिर्फ़ उस व्यक्ति को चुप कराना होता है, ताकि वह अपने विचार खुलकर न रख पाए। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स यह दावा करते हैं कि वे नफ़रत, हिंसा और भेदभाव फैलाने वाली सामग्री के खिलाफ सख्त हैं। फेसबुक, ट्विटर (X), यूट्यूब, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप सभी ने अपनी-अपनी "कम्युनिटी गाइडलाइन्स" और "हेट स्पीच पॉलिसी" बनाई है, जिनमें साफ लिखा है कि जातिगत गालियां, धमकियां, या जाति के आधार पर दूसरों को नीचा दिखाने वाली सामग्री की अनुमति नहीं है। इन नीतियों के मुताबिक, ऐसा कंटेंट पकड़े जाने पर या तो तुरंत हटा दिया जाता है, या अकाउंट सस्पेंड कर दिया जाता है। कुछ कंपनियाँ मशीन लर्निंग और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल कर स्वचालित रूप से ऐसे पोस्ट पकड़ने का प्रयास करती हैं। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि ये नीतियां अक्सर कागज़ों में अच्छी दिखती हैं, व्यावहारिक स्तर पर इनमें कई कमियां हैं। पहली समस्या भाषा और लोकल संदर्भ की है—भारत जैसे देश में जहां सैकड़ों बोलियाँ और भाषाएं हैं, वहां AI एल्गोरिद्म को हर भाषा में अपमानजनक या जातिवादी शब्दों को पहचानना मुश्किल होता है। दूसरी दिक़्कत यह है कि इन प्लेटफ़ॉर्म्स की प्राथमिकता हमेशा ‘कंटेंट हटाना’ नहीं होती, बल्कि ‘यूज़र ऐक्टिविटी बनाए रखना’ होती है, क्योंकि उनका बिज़नेस मॉडल इसी पर टिकता है। कई बार विवादास्पद और भड़काऊ कंटेंट ज्यादा एंगेजमेंट लाता है, जिससे कंपनियां उसे हटाने में देरी करती हैं। तीसरी चुनौती राजनीतिक दबाव की है—कुछ खास समय, जैसे चुनावों के दौरान, कंपनियां इस डर से कदम रोक लेती हैं कि कहीं उन पर पक्षपात का आरोप न लग जाए। इसका नतीजा यह होता है कि सोशल मीडिया पर हेट स्पीच और जातिगत नफ़रत से भरे पोस्ट या तो देर से हटते हैं, या कई बार हटते ही नहीं। यूज़र्स भले शिकायत करें, लेकिन हर रिपोर्ट का एक जैसा नतीजा नहीं निकलता। जो कंटेंट अंग्रेजी में साफ-साफ नफ़रत जैसा दिखता है, वह जल्दी हट सकता है, लेकिन स्थानीय भाषा में वही अपमानजनक पोस्ट महीनों तक पड़ा रहता है। और तब तक उसका असर समाज में फैल चुका होता है।सोशल मीडिया पर फैल रही जातिगत नफ़रत का असर सिर्फ़ ऑनलाइन बातचीत तक सीमित नहीं है—यह असली ज़िंदगी में रिश्तों, भरोसे और सामाजिक माहौल को भी तोड़ देता है। सबसे बड़ा असर दिखता है सामाजिक ध्रुवीकरण में। जब लोग लगातार अपनी ही जाति या विचारधारा के ग्रुप में कंटेंट पढ़ते-सुनते रहते हैं, तो वे अलग सोच रखने वालों को ‘दुश्मन’ की तरह देखने लगते हैं। यह "हम बनाम वे" वाली मानसिकता असली दुनिया में भी टकराव पैदा करती है। दूसरा बड़ा असर युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। जो बच्चे और युवा रोज़ सोशल मीडिया पर जातिगत गालियां, झगड़े या धमकियों वाले पोस्ट देखते हैं, वे या तो खुद कट्टर और नफ़रत से भरे हो जाते हैं, या फिर डर और तनाव में जीने लगते हैं। कुछ मामलों में तो ऑनलाइन झगड़े ऑफलाइन हिंसा में बदल चुके हैं—गांव में जातिगत झगड़ा सिर्फ़ इसलिए भड़क गया क्योंकि फेसबुक या व्हाट्सएप पर एक भड़काऊ मैसेज वायरल हो गया था। इसके अलावा, ये नफ़रत लोकतांत्रिक संवाद पर भी चोट करती है। जहाँ सोशल मीडिया एक खुले और स्वस्थ संवाद का माध्यम बन सकता था, वहां यह लगातार चिल्लाहट, गालियों और अफवाहों से भर रहा है। नतीजा यह है कि जो लोग गंभीर और रचनात्मक चर्चा करना चाहते हैं, वे पीछे हटने लगते हैं। इससे जनमत भी प्रभावित होता है, और समाज की एकता पर सीधा खतरा आता है। अगर हमें सोशल मीडिया पर फैल रही जातिगत नफ़रत, झूठी खबरों और ट्रोलिंग को रोकना है, तो सबसे पहले यह समझना होगा कि यह सिर्फ़ ऑनलाइन की समस्या नहीं है—इसकी जड़ें हमारे समाज में गहरी हैं। इसलिए समाधान भी दो स्तर पर होना चाहिए: एक, समाज के अंदर जागरूकता; और दूसरा, तकनीकी और कानूनी व्यवस्था। सबसे पहले तो लोगों को डिजिटल साक्षरता (Digital Literacy) सिखानी होगी। हमें बच्चों और युवाओं को यह बताना होगा कि इंटरनेट पर दिखने वाली हर चीज़ सच नहीं होती, और बिना जांचे-परखे किसी खबर या मैसेज को शेयर करना कितना खतरनाक हो सकता है।
दूसरा, सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों को मिलकर काम करना होगा। सरकार को ऐसे सख़्त कानून लाने चाहिए जो जातिगत या भेदभावपूर्ण कंटेंट फैलाने वालों पर तुरंत कार्रवाई कर सकें। वहीं कंपनियों को अपनी तकनीक को लोकल भाषाओं और सांस्कृतिक संदर्भ के हिसाब से अपडेट करना होगा, ताकि वे क्षेत्रीय भाषाओं में लिखे गए अपमानजनक या हेट स्पीच वाले पोस्ट भी पहचान सकें। रिपोर्ट किए गए कंटेंट पर तेज़ और पारदर्शी कार्रवाई होनी चाहिए ताकि यूज़र्स का भरोसा बना रहे। तीसरा, हमें सकारात्मक कंटेंट को बढ़ावा देना होगा। जितनी मेहनत लोग नफ़रत वाली पोस्ट फैलाने में करते हैं, उतनी ही कोशिश हमें प्रेरणादायक कहानियों, आपसी मेल-जोल और समानता के संदेशों को फैलाने में करनी चाहिए। अगर सोशल मीडिया पर आने वाला ज़्यादातर कंटेंट एकता और सहयोग का होगा, तो नफ़रत वाले खातों का असर अपने आप कम हो जाएगा। आने वाले वक्त में यह समस्या और जटिल हो सकती है क्योंकि अब AI और डीपफेक (Deepfake) जैसी तकनीकें तेजी से बढ़ रही हैं। डीपफेक तकनीक की मदद से किसी का चेहरा और आवाज़ बदलकर झूठा वीडियो बनाना अब आसान और सस्ता हो चुका है। इससे फेक न्यूज़ और नफ़रत फैलाना और भी खतरनाक हो जाएगा, क्योंकि लोग नकली वीडियो देखकर उसे सच मान लेंगे। इसके अलावा, सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म ऐसे बनाए गए हैं कि वे यूज़र्स को वही कंटेंट ज्यादा दिखाते हैं जिसमें उनकी रुचि है। इसका मतलब यह है कि अगर किसी ने नफ़रत फैलाने वाले कुछ पोस्ट देखे या लाइक किए, तो उसे आगे भी उसी तरह के और उग्र पोस्ट दिखाए जाएंगे। इससे “इको चेंबर” (Echo Chamber) बनते हैं, जिसमें लोग सिर्फ़ अपने जैसे विचार सुनते हैं और बाकी सोच से दूर हो जाते हैं। एक और चुनौती यह है कि भारत जैसे बड़े देश में इतने सारे प्लेटफ़ॉर्म और भाषाएं होने के कारण हर जगह एक जैसा कानून या पॉलिसी लागू करना मुश्किल है। तकनीकी कंपनियों को इतने सारे यूज़र्स और कंटेंट की निगरानी करना आसान नहीं होगा, खासकर तब जब नफ़रत फैलाने वाले लोग भी हर दिन नए-नए तरीके ईजाद कर रहे हों। डिजिटल युग ने हमें अभिव्यक्ति की एक नई आज़ादी दी है, लेकिन इसके साथ ज़िम्मेदारी भी आई है। सोशल मीडिया एक ऐसा औज़ार है जिससे हम समाज को जोड़ सकते हैं, लेकिन अगर इसका गलत इस्तेमाल हो तो यह हमें तोड़ भी सकता है। जातिगत नफ़रत, फेक न्यूज़ और ट्रोलिंग सिर्फ़ ऑनलाइन की दिक़्क़त नहीं हैं—ये हमारी सोच और मूल्यों का आईना भी हैं। इसीलिए इनका समाधान सिर्फ कानून से नहीं, बल्कि हमारी सोच बदलने से भी होगा।
जरूरत है कि हम सोशल मीडिया को जिम्मेदारी से इस्तेमाल करें, सच और झूठ में फर्क समझें, और अनजाने में भी किसी को नीचा दिखाने या नफ़रत फैलाने वाली चीज़ का हिस्सा न बनें। अगर सरकार, टेक कंपनियां और आम नागरिक मिलकर ईमानदारी से कदम उठाएँ, तो यह डिजिटल मंच समाज को बाँटने के बजाय जोड़ने का काम करेगा। तभी हम असली मायने में कह पाएंगे कि तकनीक ने हमें आगे बढ़ाया है, न कि पीछे धकेला।
- निक नागोरिया 🙂

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